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pahchaan
पहचान रेत पर चलकर बने चिन्हो मे मेरी जान है, बस यही पहचान है, क्यों भरे थे कल्पना की तूलिका मे रंग मैने, अब इन्ही रंगो के वीराने मे मेरी जान है बस यही पहचान है, रंगो के इंद्रधनुष से तो कब का नाता टूट गया, अब तो आंखो से निकलते अश्रु ही मेरा मान है बस यही पहचान है, उम्मीद की छोटी किरण और मन का गुलिस्ता खिल उठा, टूटे सपनो से चुभे नश्तर ही मेरा मान है बस यही पहचान है, आँधियों के संग कुछ तिनके भी उड़कर आ गये, इन तिनको को भी खूदपर मुझसे ज्यादा गुमान है, बस यही पहचान है, अश्क़ आंखो मे सजे और सांसो मे तूफान है, बस यही पहचान है, देह से तो कब की जा चूकि है मेरी आत्मा, अबतो सांसो से ही मेरी जान का अनुमान है बस यही पहचान है, मन में उठती आँधियों की धुंद में हूँ खो चुकी, अब तो सांसो की वो अन्तिम किस्त ही अंजाम है बस यही पहचान है........................ बस यही पहचान है...........................................
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